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लोकतंत्र का खेल तमाशा,देख मदारी लाया है, लूट लूट कर पेट भरें सब,जितना जिसने पाया है, राज यहाँ वो करता जिसको,काल कोठरी मिलनी थी, जनता नें खुद अपने सर पर,चोरों को बैठाया है।।
जिसकी लाठी भैंस है उसकी,कहीं नहीं कुछ बदला है, नारी कल भी अबला ही थी,आज भी केवल अबला है, जिसने चाहा जैसे चाहा,उसको नाच नचाया है, जनता नें खुद अपने सर पर,चोरों को बैठाया है।।
जाने कितने दागी नेता,माननीय बन घूम रहे, रक्त पी रहे भारत माँ का,मस्त नशे झूम रहे, जनता को जाती में बांटा,राज अकंटक पाया है, जनता नें खुद अपने सर पर,चोरों को बैठाया है।।
गजब व्यवस्था न्याय की देखो,केस चले है सालों तक, न्याय सिमटकर बैठा केवल,ताकत दौलत वालों तक, न्याय बिक रहा यही जान कर,अपराधी बौराया है, जनता नें खुद अपने सर पर, चोरों को बैठाया है।।
लड़ा दिया अगड़े पिछड़े में,भला किसी का किया नहीं, जनता का हक सत्ता नें तो,भूल कभी भी दिया नहीं, जिसने भी हक माँगा उसको,ताकत से डरवाया है, जनता नें खुद अपने सर पर,चोरों को बैठाया है।।
सत्ता पर काबिज रहने की,सारी तिकड़म लगा रहे, जनता के पैसों की लाठी,जनता के सर जमा रहे, जाने कितनी आवाजों को,लाठी से दबवाया है, जनता नें खुद अपने सर पर,चोरों को बैठाया है।।
नेता, अधिकारी, जज साहिब,लिए सुरक्षा फिरते हैं, और देश के असली मालिक,लुटते पिटते मरते हैं, अपराधों की बारिश ऐसी,खौफ़ दिलों पर छाया है, जनता नें खुद अपने सर पर,चोरों को बैठाया है।।
कब बदलेगी देश की सूरत,न्याय यहाँ कब जागेगा, अपराधों का खौफ़ दिलों से,कब हम सबके भागेगा, क्या सोंचा था भगत बोस नें,पर हमने क्या पाया है, जनता नें खुद अपने सर पर,चोरों को बैठाया है।।नरेन्द्र।।
Narendra Kumar ∙ 25 weeks ago
लोकतंत्र का खेल तमाशा,देख मदारी लाया है,
लूट लूट कर पेट भरें सब,जितना जिसने पाया है,
राज यहाँ वो करता जिसको,काल कोठरी मिलनी थी,
जनता नें खुद अपने सर पर,चोरों को बैठाया है।।
जिसकी लाठी भैंस है उसकी,कहीं नहीं कुछ बदला है,
नारी कल भी अबला ही थी,आज भी केवल अबला है,
जिसने चाहा जैसे चाहा,उसको नाच नचाया है,
जनता नें खुद अपने सर पर,चोरों को बैठाया है।।
जाने कितने दागी नेता,माननीय बन घूम रहे,
रक्त पी रहे भारत माँ का,मस्त नशे झूम रहे,
जनता को जाती में बांटा,राज अकंटक पाया है,
जनता नें खुद अपने सर पर,चोरों को बैठाया है।।
गजब व्यवस्था न्याय की देखो,केस चले है सालों तक,
न्याय सिमटकर बैठा केवल,ताकत दौलत वालों तक,
न्याय बिक रहा यही जान कर,अपराधी बौराया है,
जनता नें खुद अपने सर पर, चोरों को बैठाया है।।
लड़ा दिया अगड़े पिछड़े में,भला किसी का किया नहीं,
जनता का हक सत्ता नें तो,भूल कभी भी दिया नहीं,
जिसने भी हक माँगा उसको,ताकत से डरवाया है,
जनता नें खुद अपने सर पर,चोरों को बैठाया है।।
सत्ता पर काबिज रहने की,सारी तिकड़म लगा रहे,
जनता के पैसों की लाठी,जनता के सर जमा रहे,
जाने कितनी आवाजों को,लाठी से दबवाया है,
जनता नें खुद अपने सर पर,चोरों को बैठाया है।।
नेता, अधिकारी, जज साहिब,लिए सुरक्षा फिरते हैं,
और देश के असली मालिक,लुटते पिटते मरते हैं,
अपराधों की बारिश ऐसी,खौफ़ दिलों पर छाया है,
जनता नें खुद अपने सर पर,चोरों को बैठाया है।।
कब बदलेगी देश की सूरत,न्याय यहाँ कब जागेगा,
अपराधों का खौफ़ दिलों से,कब हम सबके भागेगा,
क्या सोंचा था भगत बोस नें,पर हमने क्या पाया है,
जनता नें खुद अपने सर पर,चोरों को बैठाया है।।नरेन्द्र।।