BAL RAM YADAV
न जाने कितने बुने थे सपने, जिन्हें दफ़न कर के मैं खड़ा हूँ;
न जाने कितने गढे थे अपने, जिन्हें विदा कर के मैं अड़ा हूँ:
मैं फिर परिन्दों के रू-ब-रू हूँ, नयी उड़ानें सिखा रहा हूँ:
मैं इस ज़माने को मोड़ दूँगा, नये तराने बना रहा हूँ.
न जाने कितने बुने थे सपने, जिन्हें दफ़न कर के मैं खड़ा हूँ;
न जाने कितने गढे थे अपने, जिन्हें विदा कर के मैं अड़ा हूँ:
मैं फिर परिन्दों के रू-ब-रू हूँ, नयी उड़ानें सिखा रहा हूँ:
मैं इस ज़माने को मोड़ दूँगा, नये तराने बना रहा हूँ.
Last Update: 10 weeks 1 day ago
AYUBKHAN U ∙ 19 Dec, 11
Hi Friend,
Have you read my latest poem 'To Rise Above'
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Please leave your valuable comment at the blog.
Thanks n regards
Ayub, Chennai-India