कभी यूँ भी
― कभी ज़िन्दगी में यूँ भी कोई मिल जाता है ,होता वह खुद कुछ नहीं ,पर हमें कुछ न होने का एहसास दिला जाता है,हैं कुछ दुनिया में ऐसे भी ,जो हमारी शक्सियत को भुला देते हैं I ∙ खुद कुछ भी न होकर ,हमारे लिए सब कुछ बन जाता है हैं वह भी खुदा तेरे ही बन्दे ,जो खुदा के करीब ले जाता है ,हमारे आत्म सम्मान की धज्जियाँ उड़ा जाता है I ∙ पर मन में यही सुकून रह जाता है ,कि बुरा करते हुए कुछ अच्छा छोड़ जाता है ,खुदा तुझे याद करना सिखा जाता है ,तेरे दर पर छोड़ जाता है I .







